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Date of publication : 29/7/2016 13:11
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हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के अख़लाक़ के कुछ नमूने।

मुआविया बिन वहब कहते हैं: मैं मदीना में हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के साथ था, आप अपनी सवारी पर सवार थे, अचानक सवारी से उतर गए, हम बाजार जाने का इरादा रखते थे लेकिन इमाम अलैहिस्सलाम सज्दा में गये और आपने एक लंबा सज्दा किया, मैं इंतजार करता रहा जब तक आपने सज्दा से सिर उठाया, मैंने कहा: मैं आप पर कुर्बान! मैंने आपको देखा कि सवारी से उतरे और सज्दे में चले गए? आपने फ़रमाया: मैं अपने ख़ुदा की नेअमतों को याद करके सज्दा कर रहा था


नेअमत का शुक्र
विलायत पोर्टलः मुआविया बिन वहब कहते हैं: मैं मदीना में हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के साथ था, आप अपनी सवारी पर सवार थे, अचानक सवारी से उतर गए, हम बाजार जाने का इरादा रखते थे लेकिन इमाम अलैहिस्सलाम सज्दा में गये और आपने एक लंबा सज्दा किया, मैं इंतजार करता रहा जब तक आपने सज्दा से सिर उठाया, मैंने कहा: मैं आप पर कुर्बान! मैंने आपको देखा कि सवारी से उतरे और सज्दे में चले गए? आपने फ़रमाया: मैं अपने ख़ुदा की नेअमतों को याद करके सज्दा कर रहा था।
गैर शियों की मदद
मुअल्ला बिन ख़ुनैस कहते हैं: हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम एक रात कि जिसमें हलकी हलकी बारिश हो रखी थी बनी साएदा के सायबान में जाने के लिए बैतुश शरफ़ से बाहर निकले, मैं आपके पीछे पीछे रवाना हुआ, अचानक आपके हाथ से कोई चीज़ गिरी, बिस्मिल्लाह, कहने के बाद आपने फरमाया: ख़ुदाया! इसको हमारी तरफ़ पलटा दे, मैं आगे बढ़ा और आपको सलाम किया, इमाम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया मुअल्ला! मैंने कहा: जी हुज़ूर, मैं आप पर क़ुर्बान, कहा: तुम भी इस चीज़ को ढ़ूंढ़ो और अगर मिल जाए तो मुझे दे दो।
अचानक मैंने देखा कि कुछ रोटियाँ हैं जो ज़मीन पर बिखरी हुई हैं, मैंने उन्हें उठाया और इमाम अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में पेश किया, उस समय मैंने इमाम अलैहिस्सलाम के हाथों में रोटी का भरा हुआ एक बैग देखा, मैंने कहा: लाइये मुझे दे दीजिए मैं इसे लेकर चलता हूँ, इमाम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया नहीं, मैं इसे ले चलूंगा, लेकिन मेरे साथ चलो।
बनी साएदा के सायबान में पहुंचे, यहां कुछ लोगों को देखा जो सोए हुये थे, इमाम अलैहिस्सलाम ने हर आदमी के कपड़ों के नीचे एक या दो रोटियाँ रखीं और जब सब तक रोटियाँ पहुंच गईं तो आप वापस पलट आए, मैं ने कहा: मैं आप पर कुर्बान! क्या यह लोग हक़ को पहचानते हैं? कहा: अगर वह हक़ को पहचानते होते तो बेशक नमक द्वारा (भी) उनकी मदद करता है।
रिश्तेदारों की मदद
अबू जअफ़र बिन खसअमी कहते हैं कि हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने मुझे पैसों की एक थैली दी और कहा: उसे बनी हाशिम के परिवार के फ़लाँ आदमी तक पहुंचा दो, लेकिन यह न बताना कि मैंने भेजी है।
अबू जाफर कहते हैं: मैंने वह थैली उस आदमी तक पहुंचा दी, उसने वह थैली लेकर कहा: अल्लाह इस थैली के भेजने वाले को अच्छा बदला दे, हर साल यह पैसे मेरे लिए भेजता है और साल के आख़िर तक खर्च चलाता हूँ, लेकिन जाफ़र सादिक़ (अ) इतनी माल व दौलत रखने के बावजूद भी मेरी कोई मदद नहीं करते।!
अख़लाक़ की बुलंदी
हाजियों में से एक आदमी मदीने में सो गया और जब जागा तो उसने यह गुमान किया कि किसी ने उसकी थैली चुरा ली है, उस थैली की तलाश में दौड़ा, हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम को नमाज़ पढ़ते देखा और वह इमाम अ. को नहीं पहचानता था, इसलिए वह इमाम अलैहिस्सलाम से उलझ गया और कहने लगा: मेरी थैली तुमने उठाई है! इमाम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि उसमें क्या था? उसने कहा: एक हजार दीनार, इमाम अलैहिस्सलाम उसे अपने घर ले आए और उसे हजार दीनार दे दिये।
लेकिन जब वह आदमी अपनी जगह पलट कर आया तो उसकी थैली उसे मिल गई, शर्मिंदा होकर हजार दीनार के साथ इमाम अलैहिस्सलाम का माल वापस करने के लिए आया, लेकिन इमाम अलैहिस्सलाम ने वह माल लेने से इंकार कर दिया और कहा कि जो कुछ हम दे दिया करते हैं उसे वापस नहीं लेते, उसने लोगों से सवाल किया कि यह आदमी ऐसे करम व एहसान वाला कौन है? तो उसे बताया गया कि यह जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम हैं, उसने कहा: यह करामत ऐसे ही इंसान के लिए सज़ावार है।





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