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Date of publication : 11/7/2017 18:46
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वहाबियत, तवस्सुल और शफ़ाअत।

उमर इब्ने ख़त्ताब ने पैग़म्बर के चचा अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तलिब के वसीले से बारिश की इस प्रकार दुआ की, ऐ अल्लाह हम ने पैग़म्बर के तवस्सुल से दुआ की तू ने क़ुबूल की, आज उनके चचा के तवस्सुल से तेरी बारगाह में बारिश होने की दुआ करते हैं।


विलायत पोर्टल : 
क़ुर्आन की आयतों से बहुत आसानी से समझा जा सकता है कि किसी अल्लाह के वली को उसकी बारगाह में वसीला बना कर अल्लाह से किसी चीज़ को मांगना किसी भी पहलू से मना नहीं है और न ही ऐसा करना अल्लाह की तौहीद से टकराव रखता है। नमूने के तौर पर अल्लाह का यह फ़रमान मौजूद है, कि जब वह अपने नफ़्सों पर अत्याचार करने के बाद आप के पास आते थे और आकर अल्लाह से इस्तेग़फ़ार करते थे और पैग़म्बर भी उनके लिए इस्तेग़फ़ार करते थे...., (सूरए निसा, आयत 64) और इसी प्रकार अहले सुन्नत और शियों की किताबों में बहुत सारी हदीसें हैं जिन से तवस्सुल और शफ़ाअत को न केवल प्रमाणित किया जा सकता है बल्कि उसे एक नेक और अच्छा काम कहा गया है। (अहले सुन्नत की किताबों में इब्ने तैमिया से पहले की किताबों में इस बारे में बहुत सी हदीसें मौजूद हैं) इस विषय पर बहुत अधिक हदीसें मौजूद हैं और बहुत सी अहम किताबों में नक़्ल हुई हैं, जिसे हम नमूने के तौर पर अहले सुन्नत की मशहूर किताबों से पेश कर रहे हैं।
1. सहीह बुख़ारी में विस्तार से मौजूद है कि जिस समय मदीने में सूखा पड़ा उमर इब्ने ख़त्ताब ने पैग़म्बर के चचा अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तलिब के वसीले से बारिश की इस प्रकार दुआ की, ऐ अल्लाह हम ने पैग़म्बर के तवस्सुल से दुआ की तू ने क़ुबूल की, आज उनके चचा के तवस्सुल से तेरी बारगाह में बारिश होने की दुआ करते हैं। (सहीह बुख़ारी, बाबे मनाक़िबे अब्बास इब्ने मुत्तलिब, हदीस न. 3710, तीसरा एडीशन बेरूत)
2. अहमद इब्ने हम्बल की मुसनद में नक़्ल हुआ है कि, एक ज़रूरतमंद शख़्स को देख कर अहले सुन्नत के तीसरे ख़लीफ़ा उस्मान ने कहा, वुज़ू करो और जा कर दो रकअत नमाज़ पढ़ो, और फ़िर पैग़म्बर को वसीला बनाते हुए यह दुआ (एक दुआ बताई) पढ़ो ताकि तुम्हारी ज़रूरत पूरी हो जाए। (मुसनदे अहमद, जिल्द 4, पेज 274, दूसरा एडीशन, 1415 हिजरी)
3. मदीने के मुफ़्ती इमाम मालिक मनसूर दवानीक़ी को पैग़म्बर से तवस्सुल करने का हुक्म देता है, और कहता है कि, पैग़म्बर अल्लाह की बारगाह में हाथ फैलाने के लिए तेरे और यहाँ तक हज़रत आदम अ.स. के लिये भी वसीला हैं, इस बात से इमाम मालिक ने हज़रत आदम की पंजतन के वसीले से दुआ क़ुबूल होने की ओर इशारा किया है।
4. इमाम शाफ़ेई तवस्सुल और वसीला बनाने को जाएज़ कहते हुए एक शेर कहते हैं जिसका मतलब यह है, अहले बैत अ.स. हमारी शफ़ाअत करने वाले हैं, यही हमारे और अल्लाह के बीच वसीला हैं। (अस-सवाएक़ुल मोहरेक़ा, पेज 274, पहला एडीशन 1417)
5. हम्बली फ़िक्ह के मशहूर ज्ञानी इब्ने अली ख़ेलाल का कहना है कि, जब भी मैं किसी मुसीबत में फँसता था इमाम काज़िम अ.स. के मज़ार पर जा कर तवस्सुल करता और उनके वसीले से दुआ करता था, बहुत कम समय में मेरी दुआ क़ुबूल हो जाती थी। (तारीख़े ख़तीबे बग़दादी, जिल्द 13, पेज 29, दूसरा एडीशन 1425, बेरूत)
6. अहले सुन्नत के एक और महान ज्ञानी बीहक़ी का बयान है कि, मुसलमानों के दूसरे ख़लीफ़ा की ख़िलाफ़त के समय में सूखा पड़ा, बिलाल पैग़म्बर के कुछ सहाबियों को लेकर पैग़म्बर की क़ब्र पर आए और इस प्रकार दुआ की, ऐ रसूले ख़ुदा अपनी उम्मत के लिए अल्लाह से बारिश की दुआ करें वरना इस सूखे और अकाल से सब मर जाएँगे। (अत-तवस्सुल इला हक़ीक़तित तवस्सुल, पेज 253)
7. सुन्नियों के एक और महान आलिम इब्ने ख़ुज़ैमा जिनके बारे में ज़हबी का कहना है कि वह शैख़ुल इस्लाम, इमाम और हाफ़िज़ थे और फ़िक़्ह व हदीस के बहुत बड़े विद्वान थे, (सीरतो आलामोन नबेला, जिल्द 11, पेज 358, पहला एडीशन 1407, बेरूत) अबू बक्र इब्ने अलमौएल नामक सुन्नी का बयान है, मैं अहले हदीस के इमाम इब्ने बक्र इब्ने ख़ुज़ैमा और अबू अली सक़फ़ी और भी अहले सुन्नत के कुछ बुज़ुर्ग आलिमों के साथ तूस की ओर जा रहा था, हम लोग जब इमाम रज़ा के मज़ार पर पहुँचे तो इब्ने ख़ुज़ैमा के इमाम से रो रो कर तवस्सुल करने को देख कर दंग रह गए। (तारीख़े ख़तीब बग़दादी, जिल्द 4, पेज 423, दूसरा एडीशन 1425 हिजरी, बेरूत)
8. अहले सुन्नत ही के एक और मशहूर और भरोसेमंद विद्वान अली इब्ने अहमद समहूदी अपनी किताब वफ़ाउल-वफ़ा में लिखता है कि, अल्लाह की बारगाह में पैग़म्बर और उसके ख़ास बंदों के वसीले से दुआ करना, शफ़ाअत के लिए गुहार लगाना और उनसे मदद माँगना न केवल इंसान के जीवन में जाएज़ है बल्कि उसके मरने के बाद, बरज़ख़ में और यहाँ तक क़यामत में भी जाएज़ है, फिर वह हज़रत आदम के द्वारा पैग़म्बर के वसीले से की जाने वाली मशहूर दुआ को उमर इब्ने ख़त्ताब से नक़्ल करते हुए लिखता है कि हज़रत आदम जिनको भविष्य में पैग़म्बर के पैदा होने का ज्ञान था उनकी महानता को ध्यान में लाते हुए और उनको वसीला बनाते हुए अल्लाह से इस प्रकार दुआ की, ऐ अल्लाह मोहम्मद (स.अ.) के वसीले से तेरी बारगाह में इस्तेग़फ़ार करता हूँ। (वफ़ाउल-वफ़ा, जिल्द 3, पेज 1371. चौथा एडीशन, बेरूत) इसके बाद इसने अपनी किताब में इतिहास के कई नमूने पेश किए जिसमें ख़ुल्फ़ा के समय में लोग पैग़म्बर के मज़ार पर जाकर उनसे तवस्सुल करते और उनके वसीले से दुआ करते थे।
9. तेरहवीं सदी के सुन्नियों के मशहूर मुफ़स्सिर आलूसी ने अपनी मशहूर तफ़सीर रूहुल मआनी में तवस्सुल और शफ़ाअत के बारे में आयतों और हदीसों के विश्लेषण के बाद इस प्रकार लिखा है कि, इन आयतों और हदीसों के ध्यानपूर्वक विश्लेषण के बाद अल्लाह की बारगाह में पैग़म्बर को वसीला बना कर दुआ करने में कोई हर्ज नहीं है, चाहे पैग़म्बर के जीवन में उनके वसीले से दुआ की जाए या इनकी वफ़ात के बाद, उसके बाद यह भी लिखा कि पैग़म्बर के अलावा भी अगर कोई अल्लाह के नज़दीक ख़ास दर्जा रखता हो उस के तवस्सुल से भी दुआ करने में कोई हर्ज नहीं है। (रूहुल मआनी, जिल्द 6, पेज 114-115) अहले सुन्नत की और भी बहुत सी किताबों में तवस्सुल, वसीला, और शफ़ाअत को न केवल जाएज़ बल्कि अल्लाह से नज़दीक होने का कारण भी बताया है। तवस्सुल के बारे में वहाबियों के विचार अहले सुन्नत के इतने सारे महान ज्ञानी और विद्वानों के द्वारा तवस्सुल को जाएज़ साबित करने के बावजूद इब्ने तैमिया जैसे वहाबियों ने सारी हदीसों और अहले सुन्नत के इमामों की सारी बातों को इंकार करते हुए अलग ही विचार पेश किए।
1. वहाबियों के सरगना इब्ने तैमिया अपनी किताब अल-रद अला अल-अख़नाई में पैग़म्बर को वसीला बनाने, तवस्सुल करने और अल्लाह के नज़दीक अहम दर्जा रखने वालों की क़ब्रों पर जा कर दुआ करने के बारे में लिखता है, जो भी पैग़म्बर की क़ब्र की ज़ियारत और उनसे तवस्सुल करने के इरादे से जाए, और उसके जाने का असली उद्देश्य पैग़म्बर की क़ब्र की ज़ियारत, उनसे तवस्सुल और उनके वसीले से दुआ करना हो तो ऐसा इंसान मुशरिक है और इस्लाम से ख़ारिज है। ( अल-रद अला अल-अख़नाई, पेज 18)
2. वह इसी किताब में लिखता है कि, जो भी अल्लाह के अलावा किसी को भी पुकारे और उससे मदद माँगे, और जो इस दुनिया से जा चुके हैं चाहे नबी ही क्यों न हों उनके वसीले से तवस्सुल करे और शफ़ाअत का सवाल करे वह मुशरिक है। ( अल-रद अला अल-अख़नाई, पेज 52)
3. मरने वाले से कुछ माँगना और उनसे तवस्सुल करना चाहे वह नबी हो या कोई दूसरा, सभी मुसलमानों के नज़दीक हराम है और ऐसा करने वाला मुशरिक है, और ऐसे किसी भी काम का हुक्म अल्लाह न ही अल्लाह ने दिया और न ही किसी सहाबी ने ऐसा काम अंजाम दिया और न ही किसी ने इसको मुसतहब कहा है, इसीलिए तवस्सुल और शफ़ाअत हराम है। ( अल-रद अला अल-अख़नाई, पेज 31)
4. मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब अपनी किताब कश्फ़ुश-शुबहात में लिखता है कि, अगर कोई कहे कि अल्लाह ने पैग़म्बर को शफ़ाअत करने का अधिकार दिया है, और वह अल्लाह की अनुमति से शफ़ाअत कर सकते हैं, तो इसमें क्या हर्ज है, अल्लाह ने उनको यह अनुमति दी है और हम उनसे शफ़ाअत का निवेदन करते हैं या तवस्सुल करते हैं, तो मेरा जवाब यह है कि ऐसा करना शिर्क है और जाएज़ नहीं है। (कश्फ़ुश-शुबहात, पेज 21, पहला एडीशन, बेरूत)
5. मोहम्मद इब्ने अबदुल वहाब कहता है कि, जो लोग मरने वालों से तवस्सुल को जाएज़ समझते और उनके द्वारा शफ़ाअत का अक़ीदा रखते हैं वह जेहालत के समय के बुतों को पूजने वाले मुशरिकों से बदतर हैं। (कश्फ़ुश-शुबहात, पेज 47, पहला एडीशन, बेरूत)
 क़ुर्आन की आयतों और अहले सुन्नत की भरोसेमंद और बड़ी किताबों में मौजूद हदीसों को पढ़ने के बाद अब बिल्कुल भी शक नहीं रह जाता कि सभी मुसलमान यहाँ तक ख़ुल्फ़ा और सुन्नियों के फ़िक़्हों के सभी इमाम तवस्सुल और शफ़ाअत को जाएज़ समझते हैं। लेकिन जो वहाबियों के विचारों का पालन करते हैं यानी अल्लाह के अलावा किसी और से तवस्सुल और शफ़ाअत को शिर्क समझते हैं, उनके अनुसार सुन्नियों के दूसरे और तीसरे ख़लीफ़ा भी मुशरिक हैं। इसलिए मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि अक़्ल का प्रयोग करते हुए इन दोनों में से किसी एक के विचार और सिध्दांत को अपनाएं, या उमर, उस्मान, इमाम शाफ़ेई और इब्ने ख़ुज़ैमा जैसे लोगों के विचारों और बातों को स्वीकार करते हुए वहाबियों से दूरी करें और उनके बातिल पर होने का ऐलान करें या वहाबियत के गुमराह और दीन से दूर कर देने वाले विचारों और बातों को स्वीकार करते हुए सहाबियों और अपनी फ़िक़्ह के इमामों को भी मुशरिक समझ लें।
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